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title: "बालकाण्ड दोहा 106"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-106"
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# बालकाण्ड · दोहा 106

**चौ०** 
> हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥  
> तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥१॥

भावार्थ: जो भगवान्‌ विष्णु और महादेवजीसे विमुख हैं और जिनकी धर्ममें प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्नमें भी वहाँ नहीं जा सकते। उस पर्वतपर एक विशाल बरगदका पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल ( छहों ऋतुओं ) में सुन्दर रहता है॥१॥

**चौ०** 
> त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥  
> एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥२॥

भावार्थ: वहाँ तीनों प्रकारकी ( शीतल, मन्द और सुगन्ध ) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजीके विश्राम करनेका वृक्ष है, जिसे वेदोंने गाया है। एक बार प्रभु श्रीशिवजी उस वृक्षके नीचे गये और उसे देखकर उनके हृदयमें बहुत आनन्द हुआ॥२॥

**चौ०** 
> निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥  
> कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥३॥

भावार्थ: अपने हाथसे बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभावसे ही ( बिना किसी खास प्रयोजनके ) वहाँ बैठ गये। कुन्दके पुष्प, चन्द्रमा और शंखके समान उनका गौर शरीर था। बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियोंके-से ( वल्कल ) वस्त्र धारण किये हुए थे॥३॥

**चौ०** 
> तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥  
> भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥४॥

भावार्थ: उनके चरण नये ( पूर्णरूपसे खिले हुए ) लाल कमलके समान थे, नखोंकी ज्योति भक्तोंके हृदयका अन्धकार हरनेवाली थी। साँप और भस्म ही उनके भूषण थे और उन त्रिपुरासुरके शत्रु शिवजीका मुख शरद्‌ ( पूर्णिमा )-के चन्द्रमाकी शोभाको भी हरनेवाला ( फीकी करनेवाला ) था॥४॥

**दो०** 
> जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल।  
> नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल॥१०६॥

भावार्थ: उनके सिरपर जटाओंका मुकुट और गङ्गाजी [ शोभायमान ] थीं। कमलके समान बड़े-बड़े नेत्र थे। उनका नील कण्ठ था और वे सुन्दरताके भण्डार थे। उनके मस्तकपर द्वितीयाका चन्द्रमा शोभित था॥१०६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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