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title: "बालकाण्ड दोहा 102"
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# बालकाण्ड · दोहा 102

**चौ०** 
> बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥  
> जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥१॥

भावार्थ: शिवजीने बहुत तरहसे अपनी सासको समझाया। तब वे शिवजीके चरणोंमें सिर नवाकर घर गयीं। फिर माताने पार्वतीको बुला लिया और गोदमें बैठाकर यह सुन्दर सीख दी—॥१॥

**चौ०** 
> करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥  
> बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥२॥

भावार्थ: हे पार्वती! तू सदा शिवजीके चरणकी पूजा करना, नारियोंका यही धर्म है। उनके लिये पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकारकी बातें कहते-कहते उनकी आँखोंमें आँसू भर आये और उन्होंने कन्याको छातीसे चिपटा लिया॥२॥

**चौ०** 
> कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥  
> भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥३॥

भावार्थ: [ फिर बोलीं कि ] विधाताने जगत्‌में स्त्रीजातिको क्यों पैदा किया ? पराधीनको सपनेमें भी सुख नहीं मिलता। यों कहती हुई माता प्रेममें अत्यन्त विकल हो गयी, परन्तु कुसमय जानकर ( दुःख करनेका अवसर न जानकर ) उन्होंने धीरज धरा॥३॥

**चौ०** 
> पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥  
> सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥४॥

भावार्थ: मैना बार-बार मिलती हैं और [ पार्वतीके ] चरणोंको पकड़कर गिर पड़ती हैं। बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता। भवानी सब स्त्रियोंसे मिल-भेंटकर फिर अपनी माताके हृदयसे जा लिपटीं॥४॥

**छं०** 
> जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।  
> फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥  
> जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।  
> सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥

भावार्थ: पार्वतीजी मातासे फिर मिलकर चलीं, सब किसीने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिये। पार्वतीजी फिर-फिरकर माताकी ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजीके पास ले गयीं। महादेवजी सब याचकोंको सन्तुष्ट कर पार्वतीके साथ घर ( कैलास ) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे और आकाशमें सुन्दर नगाड़े बजने लगे।

**दो०** 
> चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।  
> बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु॥१०२॥

भावार्थ: तब हिमवान्‌ अत्यन्त प्रेमसे शिवजीको पहुँचानेके लिये साथ चले। वृषकेतु ( शिवजी ) ने बहुत तरहसे उन्हें सन्तोष कराकर विदा किया॥१०२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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