---
title: "बालकाण्ड दोहा 101"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-101"
lang: "hi"
---

# बालकाण्ड · दोहा 101

**चौ०** 
> जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥  
> गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥१॥

भावार्थ: वेदोंमें विवाहकी जैसी रीति कही गयी है, महामुनियोंने वह सभी रीति करवायी। पर्वतराज हिमाचलने हाथमें कुश लेकर तथा कन्याका हाथ पकड़कर उन्हें भवानी ( शिवपत्नी ) जानकर शिवजीको समर्पण किया॥१॥

**चौ०** 
> पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥  
> बेदमंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥२॥

भावार्थ: जब महेश्वर ( शिवजी ) ने पार्वतीका पाणिग्रहण किया, तब [ इन्द्रादि ] सब देवता हृदयमें बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमन्त्रोंका उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजीका जय-जयकार करने लगे॥२॥

**चौ०** 
> बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥  
> हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥३॥

भावार्थ: अनेकों प्रकारके बाजे बजने लगे। आकाशसे नाना प्रकारके फूलोंकी वर्षा हुई। शिव-पार्वतीका विवाह हो गया। सारे ब्रह्माण्डमें आनन्द भर गया॥३॥

**चौ०** 
> दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥  
> अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥४॥

भावार्थ: दासी, दास, रथ, घोड़े, हाथी, गायें, वस्त्र और मणि आदि अनेक प्रकारकी चीजें, अन्न तथा सोनेके बर्तन गाड़ियोंमें लदवाकर दहेजमें दिये, जिनका वर्णन नहीं हो सकता॥४॥

**छं०** 
> दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।  
> का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥  
> सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।  
> पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥

भावार्थ: बहुत प्रकारका दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचलने कहा—हे शङ्कर! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? [ इतना कहकर ] वे शिवजीके चरणकमल पकड़कर रह गये। तब कृपाके सागर शिवजीने अपने ससुरका सभी प्रकारसे समाधान किया। फिर प्रेमसे परिपूर्णहृदय मैनाजीने शिवजीके चरणकमल पकड़े [ और कहा— ]।

**दो०** 
> नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।  
> छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥१०१॥

भावार्थ: हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणोंके समान [ प्यारी ] है। आप इसे अपने घरकी टहलनी बनाइयेगा और इसके सब अपराधोंको क्षमा करते रहियेगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिये॥१०१॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-100  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/bal-kand/doha-102

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
