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title: "बालकाण्ड दोहा 100"
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# बालकाण्ड · दोहा 100

**चौ०** 
> बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे॥  
> बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी॥१॥

भावार्थ: सब देवताओंको आदरसहित बुलवा लिया और सबको यथायोग्य आसन दिये। वेदकी रीतिसे वेदी सजायी गयी और स्त्रियाँ सुन्दर श्रेष्ठ मङ्गलगीत गाने लगीं॥ १ ॥

**चौ०** 
> सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥  
> बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥२॥

भावार्थ: वेदिकापर एक अत्यन्त सुन्दर दिव्य सिंहासन था, जिस [ की सुन्दरता ] का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि वह स्वयं ब्रह्माजीका बनाया हुआ था। ब्राह्मणोंको सिर नवाकर और हृदयमें अपने स्वामी श्रीरघुनाथजीका स्मरण करके शिवजी उस सिंहासनपर बैठ गये॥ २॥

**चौ०** 
> बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाईं। करि सिंगारु सखीं लै आईं॥  
> देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है॥३॥

भावार्थ: फिर मुनीश्वरोंने पार्वतीजीको बुलाया। सखियाँ शृङ्गार करके उन्हें ले आयीं। पार्वतीजीके रूपको देखते ही सब देवता मोहित हो गये। संसारमें ऐसा कवि कौन है जो उस सुन्दरताका वर्णन कर सके!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा॥  
> सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी॥४॥

भावार्थ: पार्वतीजीको जगदम्बा और शिवजीकी पत्नी समझकर देवताओंने मन-ही-मन प्रणाम किया। भवानीजी सुन्दरताकी सीमा हैं। करोड़ों मुखोंसे भी उनकी शोभा नहीं कही जा सकती॥ ४॥

**छं०** 
> कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।  
> सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥  
> छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।  
> अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥

भावार्थ: जगज्जननी पार्वतीजीकी महान् शोभाका वर्णन करोड़ों मुखोंसे भी करते नहीं बनता। वेद, शेषजी और सरस्वतीजीतक उसे कहते हुए सकुचा जाते हैं, तब मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनतीमें है। सुन्दरता और शोभाकी खान माता भवानी मण्डपके बीचमें, जहाँ शिवजी थे, वहाँ गयीं। वे संकोचके मारे पति ( शिवजी ) के चरणकमलोंको देख नहीं सकतीं, परन्तु उनका मनरूपी भौंरा तो वहीं [ रस-पान कर रहा ] था।

**दो०** 
> मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।  
> कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥१००॥

भावार्थ: मुनियोंकी आज्ञासे शिवजी और पार्वतीजीने गणेशजीका पूजन किया। मनमें देवताओंको अनादि समझकर कोई इस बातको सुनकर शङ्का न करे [ कि गणेशजी तो शिव-पार्वतीकी सन्तान हैं, अभी विवाहसे पूर्व ही वे कहाँसे आ गये ]॥१००॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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