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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 98"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 98

**चौ०** 
> पितु बैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा॥  
> सुखनिधान अस पितु गृह मोरें। पिय बिहीन मन भाव न भोरें॥१॥

भावार्थ: मैंने पिताजीके ऐश्वर्यकी छटा देखी है, जिनके चरण रखनेकी चौकीसे सर्वशिरोमणि राजाओंके मुकुट मिलते हैं ( अर्थात् बड़े-बड़े राजा जिनके चरणोंमें प्रणाम करते हैं )। ऐसे पिताका घर भी, जो सब प्रकारके सुखोंका भण्डार है, पतिके बिना मेरे मनको भूलकर भी नहीं भाता ॥ १ ॥

**चौ०** 
> ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ॥  
> आगें होइ जेहि सुरपति लेई। अरध सिंघासन आसनु देई॥२॥

भावार्थ: मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट् हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकोंमें प्रकट है; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासनपर बैठनेके लिये स्थान देता है, ॥ २ ॥

**चौ०** 
> ससुर एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू॥  
> बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा॥३॥

भावार्थ: ऐसे [ ऐश्वर्य और प्रभावशाली ] ससुर; [ उनकी राजधानी ] अयोध्याका निवास; प्रिय कुटुम्बी और माताके समान सासुएँ—ये कोई भी श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंकी रजके बिना मुझे स्वप्नमें भी सुखदायक नहीं लगते ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा॥  
> कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्रानपति संगा॥४॥

भावार्थ: दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियाँ; कोल, भील, हिरन और पक्षी—प्राणपति ( रघुनाथजी ) के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देनेवाले होंगे ॥ ४ ॥

**दो०** 
> सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।  
> मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ॥९८॥

भावार्थ: अतः सास और ससुरके पाँव पड़कर, मेरी ओरसे विनती कीजियेगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें; मैं वनमें स्वभावसे ही सुखी हूँ ॥ ९८ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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