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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 97"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 97

**चौ०** 
> बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती। आरति प्रीति न सो कहि जाती॥  
> पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना॥१॥

भावार्थ: राजाने जिस तरह ( जिस दीनता और प्रेमसे ) विनती की है, वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने पिताका सन्देश सुनकर सीताजीको करोड़ों ( अनेकों ) प्रकारसे सीख दी ॥ १ ॥

**चौ०** 
> सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरहु त सब कर मिटै खभारू॥  
> सुनि पति बचन कहति बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही॥२॥

भावार्थ: [ उन्होंने कहा— ] जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिन्ता मिट जाय। पतिके वचन सुनकर जानकीजी कहती हैं—हे प्राणपति! हे परम स्नेही! सुनिये ॥ २ ॥

**चौ०** 
> प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी॥  
> प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई। कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई॥३॥

भावार्थ: हे प्रभो! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। [ कृपा करके विचार तो कीजिये ] शरीरको छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है? सूर्यकी प्रभा सूर्यको छोड़कर कहाँ जा सकती है? और चाँदनी चन्द्रमाको त्यागकर कहाँ जा सकती है? ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई॥  
> तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी॥४॥

भावार्थ: इस प्रकार पतिको प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मन्त्रीसे सुहावनी वाणी कहने लगीं—आप मेरे पिताजी और ससुरजीके समान मेरा हित करनेवाले हैं। आपको मैं बदलेमें उत्तर देती हूँ, यह बहुत ही अनुचित है ॥ ४ ॥

**दो०** 
> आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात।  
> आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात॥९७॥

भावार्थ: किन्तु हे तात! मैं आर्त्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूँ, आप बुरा न मानियेगा। आर्यपुत्र ( स्वामी ) के चरणकमलोंके बिना जगत्‌में जहाँतक नाते हैं सभी मेरे लिये व्यर्थ हैं ॥ ९७ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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