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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 96"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 96

**चौ०** 
> तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें। बिनती करउँ तात कर जोरें॥  
> सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें। दुख न पाव पितु सोच हमारें॥१॥

भावार्थ: आप भी पिताके समान ही मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूँ कि आपका भी सब प्रकारसे वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगोंके सोचमें दुःख न पावें ॥ १ ॥

**चौ०** 
> सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिकल निषादू॥  
> पुनि कछु लखन कही कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी॥२॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी और सुमन्त्रका यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियोंसहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मणजीने कुछ कड़वी बात कही। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उसे बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया ॥ २ ॥

**चौ०** 
> सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई॥  
> कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू। सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू॥३॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने सकुचाकर, अपनी सौगंध दिलाकर सुमन्त्रजीसे कहा कि आप जाकर लक्ष्मणका यह सन्देश न कहियेगा। सुमन्त्रने फिर राजाका सन्देश कहा कि सीता वनके क्लेश न सह सकेंगी ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया। सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया॥  
> नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना॥४॥

भावार्थ: अतएव जिस तरह सीता अयोध्याको लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्रजीको वही उपाय करना चाहिये। नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारेका होकर वैसे ही नहीं जीऊँगा जैसे बिना जलके मछली नहीं जीती ॥ ४ ॥

**दो०** 
> मइकें ससुरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान।  
> तहँ तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान॥९६॥

भावार्थ: सीताके मायके ( पिताके घर ) और ससुरालमें सब सुख हैं। जबतक यह विपत्ति दूर नहीं होती, तबतक वे जब जहाँ जी चाहे, वहीं सुखसे रहेंगी॥ ९६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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