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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 92"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 92

**चौ०** 
> भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी॥  
> भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी॥१॥

भावार्थ: वह सूर्यकुलरूपी वृक्षके लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धिने सम्पूर्ण विश्वको दुःखी कर दिया। श्रीराम-सीताको जमीनपर सोते हुए देखकर निषादको बड़ा दुःख हुआ॥ १ ॥

**चौ०** 
> बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥  
> काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥२॥

भावार्थ: तब लक्ष्मणजी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिके रससे सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले—हे भाई! कोई किसीको सुख-दुःखका देनेवाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मोंका फल भोगते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा॥  
> जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू। संपति बिपति करमु अरु कालू॥३॥

भावार्थ: संयोग ( मिलना ), वियोग ( बिछुड़ना ), भले-बुरे भोग, शत्रु, मित्र और उदासीन—ये सभी भ्रमके फंदे हैं। जन्म-मृत्यु, सम्पत्ति-विपत्ति, कर्म और काल—जहाँतक जगत्‌के जंजाल हैं; ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू॥  
> देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं॥४॥

भावार्थ: धरती, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहाँतक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मनके अंदर विचारनेमें आते हैं, इन सबका मूल मोह ( अज्ञान ) ही है। परमार्थतः ये नहीं हैं ॥ ४ ॥

**दो०** 
> सपनें होइ भिखारि नृपु रंकु नाकपति होइ।  
> जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ॥९२॥

भावार्थ: जैसे स्वप्नमें राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्गका स्वामी इन्द्र हो जाय, तो जागनेपर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य-प्रपञ्चको हृदयसे देखना चाहिये ॥ ९२ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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