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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 90"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 90

लक्ष्मण-निषाद-संवाद, श्रीराम-सीतासे सुमन्त्रका संवाद, सुमन्त्रका लौटना

**चौ०** 
> उठे लखनु प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी॥  
> कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन॥१॥

भावार्थ: फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजीको सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल वाणीसे मन्त्री सुमन्त्रजीको सोनेके लिये कहकर वहाँसे कुछ दूरपर धनुष-बाणसे सजकर, वीरासनसे बैठकर जागने ( पहरा देने ) लगे॥१॥

**चौ०** 
> गुहँ बोलाइ पाहरू प्रतीती। ठावँ ठावँ राखे अति प्रीती॥  
> आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भाथी सर चाप चढ़ाई॥२॥

भावार्थ: गुहने विश्वासपात्र पहरेदारोंको बुलाकर अत्यन्त प्रेमसे जगह-जगह नियुक्त कर दिया और आप कमरमें तरकस बाँधकर तथा धनुषपर बाण चढ़ाकर लक्ष्मणजीके पास जा बैठा॥२॥

**चौ०** 
> सोवत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस हृदयँ बिषादू॥  
> तनु पुलकित जलु लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई॥३॥

भावार्थ: प्रभुको जमीनपर सोते देखकर प्रेमवश निषादराजके हृदयमें विषाद हो आया। उसका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहने लगा। वह प्रेमसहित लक्ष्मणजीसे वचन कहने लगा— ॥ ३ ॥

**चौ०** 
> भूपति भवन सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न पटतर पावा॥  
> मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे॥४॥

भावार्थ: महाराज दशरथजीका महल तो स्वभावसे ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता। उसमें सुन्दर मणियोंके रचे चौबारे ( छतके ऊपर बँगले ) हैं, जिन्हें मानो रतिके पति कामदेवने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है;॥ ४॥

**दो०** 
> सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास।  
> पलँग मंजु मनि दीप जहँ सब बिधि सकल सुपास॥९०॥

भावार्थ: जो पवित्र, बड़े ही विलक्षण, सुन्दर भोगपदार्थोंसे पूर्ण और फूलोंकी सुगन्धसे सुवासित हैं; जहाँ सुन्दर पलँग और मणियोंके दीपक हैं तथा सब प्रकारका पूरा आराम है;॥ ९० ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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