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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 89"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 89

**चौ०** 
> राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी॥  
> ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥१॥

भावार्थ: श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके रूपको देखकर गाँवके स्त्री-पुरुष प्रेमके साथ चर्चा करते हैं। [ कोई कहती है— ] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं, जिन्होंने ऐसे [ सुन्दर सुकुमार ] बालकोंको वनमें भेज दिया है!॥१॥

**चौ०** 
> एक कहहिं भल भूपति कीन्हा। लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा॥  
> तब निषादपति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना॥२॥

भावार्थ: कोई एक कहते हैं—राजाने अच्छा ही किया, इसी बहाने हमें भी ब्रह्माने नेत्रोंका लाभ दिया। तब निषादराजने हृदयमें अनुमान किया, तो अशोकके पेड़को [ उनके ठहरनेके लिये ] मनोहर समझा॥२॥

**चौ०** 
> लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा। कहेउ राम सब भाँति सुहावा॥  
> पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए॥३॥

भावार्थ: उसने श्रीरघुनाथजीको ले जाकर वह स्थान दिखाया। श्रीरामचन्द्रजीने [ देखकर ] कहा कि यह सब प्रकारसे सुन्दर है। पुरवासी लोग जोहार ( वन्दना ) करके अपने-अपने घर लौटे और श्रीरामचन्द्रजी सन्ध्या करने पधारे॥३॥

**चौ०** 
> गुहँ सँवारि साँथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई॥  
> सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी। दोना भरि भरि राखेसि पानी॥४॥

भावार्थ: गुहने [ इसी बीच ] कुश और कोमल पत्तोंकी कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख-देखकर दोनोंमें भर-भरकर फल-मूल और पानी रख दिया [ अथवा अपने हाथसे फल-मूल दोनोंमें भर-भरकर रख दिये ]॥४॥

**दो०** 
> सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ।  
> सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ॥८९॥

भावार्थ: सीताजी, सुमन्त्रजी और भाई लक्ष्मणजीसहित कन्द-मूल-फल खाकर रघुकुलमणि श्रीरामचन्द्रजी लेट गये। भाई लक्ष्मणजी उनके पैर दबाने लगे॥८९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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