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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 87"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 87

**चौ०** 
> सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुँचे जाई॥  
> उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी॥१॥

भावार्थ: सीताजी और मन्त्रीसहित दोनों भाई शृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ गङ्गाजीको देखकर श्रीरामजी रथसे उतर पड़े और बड़े हर्षके साथ उन्होंने दण्डवत्‌ की॥१॥

**चौ०** 
> लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा। सबहि सहित सुखु पायउ रामा॥  
> गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला॥२॥

भावार्थ: लक्ष्मणजी, सुमन्त्र और सीताजीने भी प्रणाम किया। सबके साथ श्रीरामचन्द्रजीने सुख पाया। गङ्गाजी समस्त आनन्द-मङ्गलोंकी मूल हैं। वे सब सुखोंकी करनेवाली और सब पीड़ाओंकी हरनेवाली हैं॥२॥

**चौ०** 
> कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा॥  
> सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई॥३॥

भावार्थ: अनेक कथा-प्रसङ्ग कहते हुए श्रीरामजी गङ्गाजीकी तरङ्गोंको देख रहे हैं। उन्होंने मन्त्रीको, छोटे भाई लक्ष्मणजीको और प्रिया सीताजीको देवनदी गङ्गाजीकी बड़ी महिमा सुनायी॥३॥

**चौ०** 
> मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ॥  
> सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू। तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू॥४॥

भावार्थ: इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्गका सारा श्रम ( थकावट ) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया। जिनके स्मरणमात्रसे [ बार-बार जन्मने और मरनेका ] महान्‌ श्रम मिट जाता है, उनको ‘श्रम’ होना—यह केवल लौकिक व्यवहार ( नरलीला ) है॥४॥

**दो०** 
> सुद्ध सच्चिदानंदमय कंद भानुकुल केतु।  
> चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु॥८७॥

भावार्थ: शुद्ध ( प्रकृतिजन्य त्रिगुणोंसे रहित, मायातीत दिव्य मङ्गलविग्रह ) सच्चिदानन्दकन्दस्वरूप सूर्यकुलके ध्वजारूप भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी मनुष्योंके सदृश ऐसे चरित्र करते हैं जो संसाररूपी समुद्रके पार उतरनेके लिये पुलके समान हैं॥८७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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