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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 84"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 84

**चौ०** 
> राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े॥  
> नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी॥१॥

भावार्थ: श्रीरामजीके वियोगमें सभी व्याकुल हुए जहाँ-तहाँ [ ऐसे चुपचाप स्थिर होकर ] खड़े हैं, मानो तसवीरोंमें लिखकर बनाये हुए हैं। नगर मानो फलोंसे परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था। नगरनिवासी सब स्त्री-पुरुष बहुत-से पशु-पक्षी थे। ( अर्थात्‌ अवधपुरी अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलोंको देनेवाली नगरी थी और सब स्त्री-पुरुष सुखसे उन फलोंको प्राप्त करते थे। )॥१॥

**चौ०** 
> बिधि कैकई किरातिनि कीन्ही। जेहिं दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही॥  
> सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब ब्याकुल भागी॥२॥

भावार्थ: विधाताने कैकेयीको भीलनी बनाया, जिसने दसों दिशाओंमें दुःसह दावाग्नि ( भयानक आग ) लगा दी। श्रीरामचन्द्रजीके विरहकी इस अग्निको लोग सह न सके। सब लोग व्याकुल होकर भाग चले॥२॥

**चौ०** 
> सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं॥  
> जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू॥३॥

भावार्थ: सबने मनमें विचार कर लिया कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजीके बिना सुख नहीं है। जहाँ श्रीरामजी रहेंगे, वहीं सारा समाज रहेगा। श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यामें हमलोगोंका कुछ काम नहीं है॥३॥

**चौ०** 
> चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई॥  
> राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही॥४॥

भावार्थ: ऐसा विचार दृढ़ करके देवताओंको भी दुर्लभ सुखोंसे पूर्ण घरोंको छोड़कर सब श्रीरामचन्द्रजीके साथ चल पड़े। जिनको श्रीरामजीके चरणकमल प्यारे हैं, उन्हें क्या कभी विषयभोग वशमें कर सकते हैं॥४॥

**दो०** 
> बालक बृद्ध बिहाइ गृहँ लगे लोग सब साथ।  
> तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ॥८४॥

भावार्थ: बच्चों और बूढ़ोंको घरोंमें छोड़कर सब लोग साथ हो लिये। पहले दिन श्रीरघुनाथजीने तमसा नदीके तीरपर निवास किया॥८४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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