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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 83"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 83

**चौ०** 
> तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए॥  
> चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई॥१॥

भावार्थ: तब ( वहाँ पहुँचकर ) सुमन्त्रने राजाके वचन श्रीरामचन्द्रजीको सुनाये और विनती करके उनको रथपर चढ़ाया। सीताजीसहित दोनों भाई रथपर चढ़कर हृदयमें अयोध्याको सिर नवाकर चले॥१॥

**चौ०** 
> चलत रामु लखि अवध अनाथा। बिकल लोग सब लागे साथा॥  
> कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीको जाते हुए और अयोध्याको अनाथ [ होते हुए ] देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये। कृपाके समुद्र श्रीरामजी उन्हें बहुत तरहसे समझाते हैं, तो वे [ अयोध्याकी ओर ] लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमवश फिर लौट आते हैं॥२॥

**चौ०** 
> लागति अवध भयावनि भारी। मानहुँ कालराति अँधिआरी॥  
> घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी॥३॥

भावार्थ: अयोध्यापुरी बड़ी डरावनी लग रही है। मानो अन्धकारमयी कालरात्रि ही हो। नगरके नर-नारी भयानक जन्तुओंके समान एक-दूसरेको देखकर डर रहे हैं॥३॥

**चौ०** 
> घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुँ जमदूता॥  
> बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। सरित सरोबर देखि न जाहीं॥४॥

भावार्थ: घर श्मशान, कुटुम्बी भूत-प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराजके दूत हैं। बगीचोंमें वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता॥४॥

**दो०** 
> हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर।  
> पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर॥८३॥

भावार्थ: करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलनेके लिये पाले हुए हिरन, नगरके [ गाय, बैल, बकरी आदि ] पशु, पपीहे, मोर, कोयल,चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर— ॥८३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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