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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 81"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 81

**चौ०** 
> एहि बिधि राम सबहि समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा॥  
> गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाइ रघुराई॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार श्रीरामजीने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया। फिर गणेशजी, पार्वतीजी और कैलासपति महादेवजीको मनाकर तथा आशीर्वाद पाकर श्रीरघुनाथजी चले॥ १ ॥

**चौ०** 
> राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू॥  
> कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू॥२॥

भावार्थ: श्रीरामजीके चलते ही बड़ा भारी विषाद हो गया। नगरका आर्तनाद ( हाहाकार ) सुना नहीं जाता। लङ्कामें बुरे शकुन होने लगे, अयोध्यामें अत्यन्त शोक छा गया और देवलोकमें सब हर्ष और विषाद दोनोंके वशमें हो गये। [ हर्ष इस बातका था कि अब राक्षसोंका नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियोंके शोकके कारण था। ]॥ २ ॥

**चौ०** 
> गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे॥  
> रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं॥३॥

भावार्थ: मूर्छा दूर हुई, तब राजा जागे और सुमन्त्रको बुलाकर ऐसा कहने लगे—श्रीराम वनको चले गये, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। न जाने ये किस सुखके लिये शरीरमें टिक रहे हैं॥ ३ ॥

**चौ०** 
> एहि तें कवन ब्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना॥  
> पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू॥४॥

भावार्थ: इससे अधिक बलवती और कौन-सी व्यथा होगी जिस दुःखको पाकर प्राण शरीरको छोड़ेंगे। फिर धीरज धरकर राजाने कहा—हे सखा! तुम रथ लेकर श्रीरामके साथ जाओ॥४॥

**दो०** 
> सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि।  
> रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि॥८१॥

भावार्थ: अत्यन्त सुकुमार दोनों कुमारोंको और सुकुमारी जानकीको रथमें चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिनके बाद लौट आना॥८१॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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