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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 79"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 79

श्रीराम-सीता-लक्ष्मणका वनगमन और नगर-निवासियोंको सोये छोड़कर आगे बढ़ना

**चौ०** 
> सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई॥  
> मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी॥१॥

भावार्थ: सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातोंको सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियोंके वस्त्र, आभूषण ( माला, मेखला आदि ) और बर्तन ( कमण्डलु आदि ) लाकर श्रीरामचन्द्रजीके आगे रख दिये और कोमल वाणीसे कहा—॥ १ ॥

**चौ०** 
> नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा॥  
> सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ॥२॥

भावार्थ: हे रघुवीर! राजाको तुम प्राणोंके समान प्रिय हो। भीरु ( प्रेमवश दुर्बल हृदयके ) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें वन जानेको वे कभी न कहेंगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥  
> भूपहि बचन बान सम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥३॥

भावार्थ: ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माताकी सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने [ बड़ा ] सुख पाया। परन्तु राजाको ये वचन बाणके समान लगे। [ वे सोचने लगे ] अब भी अभागे प्राण [ क्यों ] नहीं निकलते!॥ ३ ॥

**चौ०** 
> लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू॥  
> रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई॥४॥

भावार्थ: राजा मूर्च्छित हो गये, लोग व्याकुल हैं। किसीको कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्रीरामचन्द्रजी तुरंत मुनिका वेष बनाकर और माता-पिताको सिर नवाकर चल दिये॥ ४ ॥

**दो०** 
> सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत।  
> बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत॥७९॥

भावार्थ: वनका सब साज-सामान सजकर ( वनके लिये आवश्यक वस्तुओंको साथ लेकर ) श्रीरामचन्द्रजी स्त्री ( श्रीसीताजी ) और भाई ( लक्ष्मणजी ) सहित, ब्राह्मण और गुरुके चरणोंकी वन्दना करके सबको अचेत करके चले॥७९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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