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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 76"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 76

**चौ०** 
> गए लखनु जहँ जानकिनाथू। भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू॥  
> बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृपमंदिर आए॥१॥

भावार्थ: लक्ष्मणजी वहाँ गये जहाँ श्रीजानकीनाथजी थे, और प्रियका साथ पाकर मनमें बड़े ही प्रसन्न हुए। श्रीरामजी और सीताजीके सुन्दर चरणोंकी वन्दना करके वे उनके साथ चले और राजभवनमें आये॥ १ ॥

**चौ०** 
> कहहिं परसपर पुर नर नारी। भलि बनाइ बिधि बात बिगारी॥  
> तन कृस मन दुखु बदन मलीने। बिकल मनहुँ माखी मधु छीने॥२॥

भावार्थ: नगरके स्त्री-पुरुष आपसमें कह रहे हैं कि विधाताने खूब बनाकर बात बिगाड़ी! उनके शरीर दुबले, मन दुःखी और मुख उदास हो रहे हैं। वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जानेपर शहदकी मक्खियाँ व्याकुल हों॥ २॥

**चौ०** 
> कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं॥  
> भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा॥३॥

भावार्थ: सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर ( पीटकर ) पछता रहे हैं। मानो बिना पंखके पक्षी व्याकुल हो रहे हैं। राजद्वारपर बड़ी भीड़ हो रही है। अपार विषादका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सचिवँ उठाइ राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे॥  
> सिय समेत दोउ तनय निहारी। ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी॥४॥

भावार्थ: ‘श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं’, ये प्रिय वचन कहकर मन्त्रीने राजाको उठाकर बैठाया। सीतासहित दोनों पुत्रोंको [ वनके लिये तैयार ] देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए॥ ४॥

**दो०** 
> सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।  
> बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ॥७६॥

भावार्थ: सीतासहित दोनों सुन्दर पुत्रोंको देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदयसे लगा लेते हैं॥ ७६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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