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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 70"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 70

**चौ०** 
> समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए॥  
> कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा॥१॥

भावार्थ: जब लक्ष्मणजीने ये समाचार पाये, तब वे व्याकुल होकर उदास-मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमाञ्च हो रहा है, नेत्र आँसुओंसे भरे हैं। प्रेमसे अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये॥ १॥

**चौ०** 
> कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल तें काढ़े॥  
> सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा॥२॥

भावार्थ: वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े-खड़े देख रहे हैं। [ ऐसे दीन हो रहे हैं ] मानो जलसे निकाले जानेपर मछली दीन हो रही हो। हृदयमें यह सोच है कि हे विधाता! क्या होनेवाला है? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया?॥ २॥

**चौ०** 
> मो कहुँ काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा॥  
> राम बिलोकि बंधु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें॥३॥

भावार्थ: मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे? घरपर रखेंगे या साथ ले चलेंगे? श्रीरामचन्द्रजीने भाई लक्ष्मणको हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभीसे नाता तोड़े हुए खड़े देखा॥ ३॥

**चौ०** 
> बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर॥  
> तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू॥४॥

भावार्थ: तब नीतिमें निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुखके समुद्र श्रीरामचन्द्रजी वचन बोले— हे तात! परिणाममें होनेवाले आनन्दको हृदयमें समझकर तुम प्रेमवश अधीर मत होओ॥ ४॥

**दो०** 
> मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ।  
> लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ॥७०॥

भावार्थ: जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामीकी शिक्षाको स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेनेका लाभ पाया है; नहीं तो जगत्‌में जन्म व्यर्थ ही है॥ ७०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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