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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 69"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 69

**चौ०** 
> लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥  
> राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥१॥

भावार्थ: यह देखकर कि माता स्नेहके मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँहसे वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजीने अनेक प्रकारसे उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता॥ १॥

**चौ०** 
> तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥  
> सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥२॥

भावार्थ: तब जानकीजी सासके पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करनेके समय दैवने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया॥ २॥

**चौ०** 
> तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू। करमु कठिन कछु दोसु न मोहू॥  
> सुनि सिय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी॥३॥

भावार्थ: आप क्षोभका त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। कर्मकी गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजीके वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशाको मैं किस प्रकार बखानकर कहूँ!॥ ३॥

**चौ०** 
> बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥  
> अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥४॥

भावार्थ: उन्होंने सीताजीको बार-बार हृदयसे लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गङ्गाजी और यमुनाजीमें जलकी धारा बहे, तबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे॥ ४॥

**दो०** 
> सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार।  
> चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार॥६९॥

भावार्थ: सीताजीको सासने अनेकों प्रकारसे आशीर्वाद और शिक्षाएँ दीं और वे ( सीताजी ) बड़े ही प्रेमसे बार-बार चरणकमलोंमें सिर नवाकर चलीं॥ ६९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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