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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 65"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 65

**चौ०** 
> मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुहृद समुदाई॥  
> सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुसील सुखदाई॥१॥

भावार्थ: माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रोंका समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन ( बन्धु-बान्धव ), सहायक और सुन्दर, सुशील और सुख देनेवाला पुत्र— ॥ १ ॥

**चौ०** 
> जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते॥  
> तनु धनु धामु धरनि पुर राजू। पति बिहीन सबु सोक समाजू॥२॥

भावार्थ: हे नाथ! जहाँतक स्नेह और नाते हैं, पतिके बिना स्त्रीको सभी सूर्यसे भी बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पतिके बिना स्त्रीके लिये यह सब शोकका समाज है॥ २ ॥

**चौ०** 
> भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥  
> प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥३॥

भावार्थ: भोग रोगके समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम-यातना ( नरककी पीड़ा ) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत्‌में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी॥  
> नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरद बिमल बिधु बदनु निहारें॥४॥

भावार्थ: जैसे बिना जीवके देह और बिना जलके नदी, वैसे ही हे नाथ! बिना पुरुषके स्त्री है। हे नाथ! आपके साथ रहकर आपका शरद्-[ पूर्णिमा ] के निर्मल चन्द्रमाके समान मुख देखनेसे मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे॥ ४॥

**दो०** 
> खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल।  
> नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल॥६५॥

भावार्थ: हे नाथ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षोंकी छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी ( पत्तोंकी बनी झोंपड़ी ) ही स्वर्गके समान सुखोंकी मूल होगी॥ ६५ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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