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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 64"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 64

**चौ०** 
> सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के॥  
> सीतल सिख दाहक भइ कैसें। चकइहि सरद चंद निसि जैसें॥१॥

भावार्थ: प्रियतमके कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजीके सुन्दर नेत्र जलसे भर गये। श्रीरामजीकी यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवीको शरद्‌-ऋतुकी चाँदनी रात होती है॥१॥

**चौ०** 
> उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही॥  
> बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी॥२॥

भावार्थ: जानकीजीसे कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रोंके जल ( आँसुओं ) को जबर्दस्ती रोककर वे पृथ्वीकी कन्या सीताजी हृदयमें धीरज धरकर, ॥२॥

**चौ०** 
> लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी॥  
> दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई। जेहि बिधि मोर परम हित होई॥ ३॥

भावार्थ: सासके पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं—हे देवि! मेरी इस बड़ी भारी ढिठाईको क्षमा कीजिये। मुझे प्राणपतिने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो॥ ३॥

**चौ०** 
> मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं॥४॥

भावार्थ: परन्तु मैंने मनमें समझकर देख लिया कि पतिके वियोगके समान जगत्‌में कोई दुःख नहीं है॥ ४॥

**दो०** 
> प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान।  
> तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान॥६४॥

भावार्थ: हे प्राणनाथ! हे दयाके धाम! हे सुन्दर! हे सुखोंके देनेवाले! हे सुजान! हे रघुकुलरूपी कुमुदके खिलानेवाले चन्द्रमा! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरकके समान है॥ ६४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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