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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 63"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 63

**चौ०** 
> नर अहार रजनीचर चरहीं। कपट बेष बिधि कोटिक करहीं॥  
> लागइ अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी॥१॥

भावार्थ: मनुष्योंको खानेवाले निशाचर ( राक्षस ) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकारके कपट-रूप धारण कर लेते हैं। पहाड़का पानी बहुत ही लगता है। वनकी विपत्ति बखानी नहीं जा सकती॥१॥

**चौ०** 
> ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा॥  
> डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ॥२॥

भावार्थ: वनमें भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री-पुरुषोंको चुरानेवाले राक्षसोंके झुंड-के-झुंड रहते हैं। वनकी [ भयंकरता ] याद आनेमात्रसे धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर हे मृगलोचनि! तुम तो स्वभावसे ही डरपोक हो!॥२॥

**चौ०** 
> हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू॥  
> मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली॥३॥

भावार्थ: हे हंसगमनी! तुम वनके योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जानेकी बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे ( बुरा कहेंगे )। मानसरोवरके अमृतके समान जलसे पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्रमें जी सकती है ?॥३॥

**चौ०** 
> नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला॥  
> रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी॥४॥

भावार्थ: नवीन आमके वनमें विहार करनेवाली कोयल क्या करीलके जंगलमें शोभा पाती है ? हे चन्द्रमुखी! हृदयमें ऐसा विचारकर तुम घरहीपर रहो। वनमें बड़ा कष्ट है॥४॥

**दो०** 
> सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि।  
> सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि॥६३॥

भावार्थ: स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामीकी सीखको जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदयमें भरपेट पछताता है और उसके हितकी हानि अवश्य होती है॥६३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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