---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 62"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-62"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 62

**चौ०** 
> मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी॥  
> दिवस जात नहिं लागिहि बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा॥१॥

भावार्थ: हे सुमुखि! हे सयानी! सुनो, मैं भी पिताके वचनको सत्य करके शीघ्र ही लौटूँगा। दिन जाते देर नहीं लगेगी। हे सुन्दरी! हमारी यह सीख सुनो!॥१॥

**चौ०** 
> जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा॥  
> काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी॥२॥

भावार्थ: हे वामा! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाममें दुःख पाओगी। वन बड़ा कठिन ( क्लेशदायक ) और भयानक है। वहाँकी धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं॥२॥

**चौ०** 
> कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना॥  
> चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे॥३॥

भावार्थ: रास्तेमें कुश, काँटे और बहुत-से कंकड़ हैं। उनपर बिना जूतेके पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण-कमल कोमल और सुन्दर हैं और रास्तेमें बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं॥३॥

**चौ०** 
> कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे॥  
> भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा॥४॥

भावार्थ: पर्वतोंकी गुफाएँ, खोह ( दर्रे ), नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखातक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे [ भयानक ] शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है॥४॥

**दो०** 
> भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल।  
> ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल॥६२॥

भावार्थ: जमीनपर सोना, पेड़ोंकी छालके वस्त्र पहनना और कन्द, मूल, फलका भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे ? सब कुछ अपने-अपने समयके अनुकूल ही मिल सकेगा॥६२॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-61  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-63

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
