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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 59"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 59

**चौ०** 
> मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई॥  
> नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउँ प्रान जानकिहिं लाई॥१॥

भावार्थ: फिर मैंने रूपकी राशि, सुन्दर गुण और शीलवाली प्यारी पुत्रवधू पायी है। मैंने इन ( जानकी ) को आँखोंकी पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं ॥ १ ॥

**चौ०** 
> कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली॥  
> फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा॥२॥

भावार्थ: इन्हें कल्पलताके समान मैंने बहुत तरहसे बड़े लाड़-चावके साथ स्नेहरूपी जलसे सींचकर पाला है। अब इस लताके फूलने-फलनेके समय विधाता वाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा॥ २ ॥

**चौ०** 
> पलँग पीठ तजि गोद हिंडोरा। सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥  
> जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ। दीप बाति नहिं टारन कहऊँ॥३॥

भावार्थ: सीताने पर्यङ्कपृष्ठ ( पलंगके ऊपर ), गोद और हिंडोलेको छोड़कर कठोर पृथ्वीपर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा सञ्जीवनी जड़ीके समान [ सावधानीसे ] इनकी रखवाली करती रही हूँ! कभी दीपककी बत्ती हटानेको भी नहीं कहती॥ ३ ॥

**चौ०** 
> सोइ सिय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होइ रघुनाथा॥  
> चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी॥४॥

भावार्थ: वही सीता अब तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है। हे रघुनाथ! उसे क्या आज्ञा होती है ? चन्द्रमाकी किरणोंका रस ( अमृत ) चाहनेवाली चकोरी सूर्यकी ओर आँख किस तरह मिला सकती है॥ ४॥

**दो०** 
> करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि।  
> बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि॥५९॥

भावार्थ: हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव-जन्तु वनमें विचरते रहते हैं। हे पुत्र! क्या विषकी वाटिकामें सुन्दर सञ्जीवनी बूटी शोभा पा सकती है ?॥ ५९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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