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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 57"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 57

**चौ०** 
> देव पितर सब तुम्हहि गोसाईं। राखहुँ पलक नयन की नाईं॥  
> अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना॥१॥

भावार्थ: हे गोसाईं! सब देव और पितर तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आँखोंकी रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवासकी अवधि ( चौदह वर्ष ) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दयाकी खान और धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो॥१॥

**चौ०** 
> अस बिचारि सोइ करहु उपाई। सबहि जिअत जेहिं भेंटहु आई॥  
> जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ। करि अनाथ जन परिजन गाऊँ॥२॥

भावार्थ: ऐसा विचारकर वही उपाय करना जिसमें सबके जीते-जी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूँ, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभरको अनाथ करके सुखपूर्वक वनको जाओ॥२॥

**चौ०** 
> सब कर आजु सुकृत फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता॥  
> बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहि जानी॥३॥

भावार्थ: आज सबके पुण्योंका फल पूरा हो गया! कठिन काल हमारे विपरीत हो गया। [ इस प्रकार ] बहुत विलाप करके और अपनेको परम अभागिनी जानकर माता श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें लिपट गयीं॥३॥

**चौ०** 
> दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाहिं बिलाप कलापा॥  
> राम उठाइ मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई॥४॥

भावार्थ: हृदयमें भयानक दुःसह संताप छा गया। उस समयके बहुविध विलापका वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजीने माताको उठाकर हृदयसे लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया॥४॥

**दो०** 
> समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ।  
> जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ॥५७॥

भावार्थ: उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सासके पास जाकर उनके दोनों चरणकमलोंकी वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं॥५७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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