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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 54"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 54

**चौ०** 
> बचन बिनीत मधुर रघुबर के। सर सम लगे मातु उर करके॥  
> सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी। जिमि जवास परें पावस पानी॥१॥

भावार्थ: रघुकुलमें श्रेष्ठ श्रीरामजीके ये बहुत ही नम्र और मीठे वचन माताके हृदयमें बाणके समान लगे और कसकने लगे। उस शीतल वाणीको सुनकर कौसल्या वैसे ही सहमकर सूख गयीं जैसे बरसातका पानी पड़नेसे जवासा सूख जाता है॥१॥

**चौ०** 
> कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू॥  
> नयन सजल तन थर थर काँपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी॥२॥

भावार्थ: हृदयका विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंहकी गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रोंमें जल भर आया, शरीर थर-थर काँपने लगा। मानो मछली माँजा ( पहली वर्षाका फेन ) खाकर बदहवास हो गयी हो!॥२॥

**चौ०** 
> धरि धीरजु सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी॥  
> तात पितहि तुम्ह प्रान पिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे॥३॥

भावार्थ: धीरज धरकर, पुत्रका मुख देखकर माता गद्‌गद वचन कहने लगीं—हे तात! तुम तो पिताको प्राणोंके समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रोंको देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे॥३॥

**चौ०** 
> राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहिं अपराधा॥  
> तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू॥४॥

भावार्थ: राज्य देनेके लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था। फिर अब किस अपराधसे वन जानेको कहा? हे तात! मुझे इसका कारण सुनाओ! सूर्यवंश [ रूपी वन ] को जलानेके लिये अग्नि कौन हो गया?॥४॥

**दो०** 
> निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ।  
> सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ॥५४॥

भावार्थ: तब श्रीरामचन्द्रजीका रुख देखकर मन्त्रीके पुत्रने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंगको सुनकर वे गूँगी-जैसी ( चुप ) रह गयीं, उनकी दशाका वर्णन नहीं किया जा सकता॥५४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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