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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 53"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 53

**चौ०** 
> तात जाउँ बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू॥  
> पितु समीप तब जाएहु भैआ। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ॥१॥

भावार्थ: हे तात! मैं बलैया लेती हूँ, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया! तब पिताके पास जाना। बहुत देर हो गयी है, माता बलिहारी जाती है॥१॥

**चौ०** 
> मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला॥  
> सुख मकरंद भरे श्रियमूला। निरखि राम मनु भवँरु न भूला॥२॥

भावार्थ: माताके अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर—जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्षके फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द ( पुष्परस ) से भरे थे और श्री ( राजलक्ष्मी ) के मूल थे—ऐसे वचनरूपी फूलोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीका मनरूपी भौंरा उनपर नहीं भूला॥२॥

**चौ०** 
> धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी॥  
> पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू। जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू॥३॥

भावार्थ: धर्मधुरीण श्रीरामचन्द्रजीने धर्मकी गतिको जानकर मातासे अत्यन्त कोमल वाणीसे कहा—हे माता! पिताजीने मुझको वनका राज्य दिया है, जहाँ सब प्रकारसे मेरा बड़ा काम बननेवाला है॥३॥

**चौ०** 
> आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥  
> जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥४॥

भावार्थ: हे माता! तू प्रसन्न मनसे मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वनयात्रामें आनन्द-मङ्गल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपासे आनन्द ही होगा॥४॥

**दो०** 
> बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान।  
> आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान॥५३॥

भावार्थ: चौदह वर्ष वनमें रहकर, पिताजीके वचनको प्रमाणित ( सत्य ) कर, फिर लौटकर तेरे चरणोंका दर्शन करूँगा; तू मनको म्लान ( दुःखी ) न कर॥५३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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