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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 50"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 50

**चौ०** 
> अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू॥  
> भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू॥१॥

भावार्थ: हृदयमें ऐसा विचारकर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलङ्ककी कोठी मत बनो। भरतको अवश्य युवराजपद दो, पर श्रीरामचन्द्रजीका वनमें क्या काम है!॥१॥

**चौ०** 
> नाहिन रामु राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे॥  
> गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू॥२॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजी राज्यके भूखे नहीं हैं। वे धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले और विषय-रससे रूखे हैं ( अर्थात्‌ उनमें विषयासक्ति है ही नहीं )। [ इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्रीरामजी वन न गये तो भरतके राज्यमें विघ्न करेंगे; इतनेपर भी मन न माने तो ] तुम राजासे दूसरा ऐसा ( यह ) वर ले लो कि श्रीराम घर छोड़कर गुरुके घर रहें॥२॥

**चौ०** 
> जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे॥  
> जौं परिहास कीन्हि कछु होई। तौ कहि प्रगट जनावहु सोई॥३॥

भावार्थ: जो तुम हमारे कहनेपर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी न लगेगा। यदि तुमने कुछ हँसी की हो तो उसे प्रकटमें कहकर जना दो [ कि मैंने दिल्लगी की है ]॥३॥

**चौ०** 
> राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू॥  
> उठहु बेगि सोइ करहु उपाई। जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई॥४॥

भावार्थ: राम-सरीखा पुत्र क्या वनके योग्य है? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपायसे इस शोक और कलङ्कका नाश हो॥४॥

**छं०** 
> जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही।  
> हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥  
> जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी।  
> तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥

भावार्थ: जिस तरह [ नगरभरका ] शोक और [ तुम्हारा ] कलङ्क मिटे, वही उपाय करके कुलकी रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजीको हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्यके बिना दिन, प्राणके बिना शरीर और चन्द्रमाके बिना रात [ निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है ], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्या हो जायगी; हे भामिनी! तू अपने हृदयमें इस बातको समझ ( विचारकर देख ) तो सही।

**सो०** 
> सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित।  
> तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥५०॥

भावार्थ: इस प्रकार सखियोंने ऐसी सीख दी जो सुननेमें मीठी और परिणाममें हितकारी थी। पर कुटिला कुबरीकी सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयीने इसपर जरा भी कान नहीं दिया॥५०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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