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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 49"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 49

**चौ०** 
> एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥  
> खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥१॥

भावार्थ: कोई एक विधाताको दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगरभरमें खलबली मच गयी, सब किसीको सोच हो गया। हृदयमें दुःसह जलन हो गयी, आनन्द-उत्साह मिट गया॥१॥

**चौ०** 
> बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकई केरी॥  
> लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही॥२॥

भावार्थ: ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ, कुलकी माननीय बड़ी-बूढ़ी और जो कैकेयीकी परम प्रिय थीं, वे उसके शीलकी सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाणके समान लगते हैं॥२॥

**चौ०** 
> भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥  
> करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥३॥

भावार्थ: [ वे कहती हैं— ] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्रके समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बातको सारा जगत्‌ जानता है। श्रीरामचन्द्रजीपर तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराधसे उन्हें वन देती हो?॥३॥

**चौ०** 
> कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥  
> कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥४॥

भावार्थ: तुमने कभी सौतियाडाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वासको जानता है। अब कौसल्याने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगरपर वज्र गिरा दिया॥४॥

**दो०** 
> सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम।  
> राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम॥४९॥

भावार्थ: क्या सीताजी अपने पति ( श्रीरामचन्द्रजी ) का साथ छोड़ देंगी? क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना घर रह सकेंगे? क्या भरतजी श्रीरामचन्द्रजीके बिना अयोध्यापुरीका राज्य भोग सकेंगे? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजीके बिना जीवित रह सकेंगे? ( अर्थात्‌ न सीताजी यहाँ रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे, न भरतजी राज्य करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा )॥४९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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