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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 45"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 45

**चौ०** 
> अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥  
> सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥१॥

भावार्थ: जगत्‌में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे [ नया पाप होनेसे ] मैं नरकमें गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाय ( पूर्व पुण्योंके फलस्वरूप मिलनेवाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले )। और भी सब प्रकारके दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखोंकी ओट न हों॥१॥

**चौ०** 
> अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥  
> रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥२॥

भावार्थ: राजा मन-ही-मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपलके पत्तेकी तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजीने पिताको प्रेमके वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [ तो पिताजीको दुःख होगा ]— ॥२॥

**चौ०** 
> देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥  
> तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥३॥

भावार्थ: देश, काल और अवसरके अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे—हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्यको मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा॥३॥

**चौ०** 
> अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा॥  
> देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता॥ ४॥

भावार्थ: इस अत्यन्त तुच्छ बातके लिये आपने इतना दुःख पाया। मुझे किसीने पहले कहकर यह बात नहीं जनायी। स्वामी ( आप ) को इस दशामें देखकर मैंने मातासे पूछा। उनसे सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये ( मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई )॥४॥

**दो०** 
> मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात।  
> आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात॥४५॥

भावार्थ: हे पिताजी! इस मङ्गलके समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदयमें प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सर्वाङ्ग पुलकित हो गये॥४५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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