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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 43"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 43

**चौ०** 
> रहसी रानि राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई॥  
> सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछु जाना॥१॥

भावार्थ: रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजीका रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली—तुम्हारी शपथ और भरतकी सौगन्ध है, मुझे राजाके दुःखका दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है॥१॥

**चौ०** 
> तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता॥  
> राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू॥२॥

भावार्थ: हे तात! तुम अपराधके योग्य नहीं हो ( तुमसे माता-पिताका अपराध बन पड़े, यह सम्भव नहीं )। तुम तो माता-पिता और भाइयोंको सुख देनेवाले हो। हे राम! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता-माताके वचनों [ के पालन ] में तत्पर हो॥२॥

**चौ०** 
> पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेंपन जेहिं अजसु न होई॥  
> तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे। उचित न तासु निरादरु कीन्हे॥३॥

भावार्थ: मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूँ, तुम पिताको समझाकर वही बात कहो जिससे चौथेपन ( बुढ़ापे ) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्यने इनको तुम-जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं॥३॥

**चौ०** 
> लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहँ गयादिक तीरथ जैसे॥  
> रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए॥४॥

भावार्थ: कैकेयीके बुरे मुखमें ये शुभ वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देशमें गया आदिक तीर्थ! श्रीरामचन्द्रजीको माता कैकेयीके सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गङ्गाजीमें जाकर [ अच्छे-बुरे सभी प्रकारके ] जल शुभ, सुन्दर हो जाते हैं॥४॥

**दो०** 
> गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह।  
> सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह॥४३॥

भावार्थ: इतनेमें राजाकी मूर्च्छा दूर हुई, उन्होंने रामका स्मरण करके ( ‘राम-राम!’ कहकर ) फिरकर करवट ली। मन्त्रीने श्रीरामचन्द्रजीका आना कहकर समयानुकूल विनती की॥४३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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