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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 39"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 39

श्रीराम-कैकेयी-संवाद

**चौ०** 
> आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूँछेहु आई॥  
> चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी॥१॥

भावार्थ: तुम जल्दी रामको बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछना। राजाका रुख जानकर सुमन्त्रजी चले, समझ गये कि रानीने कुछ कुचाल की है॥१॥

**चौ०** 
> सोच बिकल मग परइ न पाऊ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ॥  
> उर धरि धीरजु गयउ दुआरें। पूँछहिं सकल देखि मनु मारें॥२॥

भावार्थ: सुमन्त्र सोचसे व्याकुल हैं, रास्तेपर पैर नहीं पड़ता ( आगे बढ़ा नहीं जाता ), [ सोचते हैं— ] रामजीको बुलाकर राजा क्या कहेंगे? किसी तरह हृदयमें धीरज धरकर वे द्वारपर गये। सब लोग उनको मनमारे ( उदास ) देखकर पूछने लगे॥२॥

**चौ०** 
> समाधानु करि सो सबही का। गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका॥  
> राम सुमंत्रहि आवत देखा। आदरु कीन्ह पिता सम लेखा॥३॥

भावार्थ: सब लोगोंका समाधान करके ( किसी तरह समझा-बुझाकर ) सुमन्त्र वहाँ गये, जहाँ सूर्यकुलके तिलक श्रीरामचन्द्रजी थे। श्रीरामचन्द्रजीने सुमन्त्रको आते देखा तो पिताके समान समझकर उनका आदर किया॥३॥

**चौ०** 
> निरखि बदनु कहि भूप रजाई। रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई॥  
> रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं। देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं॥४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीके मुखको देखकर और राजाकी आज्ञा सुनाकर वे रघुकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीको [ अपने साथ ] लिवा चले। श्रीरामचन्द्रजी मन्त्रीके साथ बुरी तरहसे ( बिना किसी लवाजमेके ) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहाँ-तहाँ विषाद कर रहे हैं॥४॥

**दो०** 
> जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु।  
> सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु॥३९॥

भावार्थ: रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजीने जाकर देखा कि राजा अत्यन्त ही बुरी हालतमें पड़े हैं, मानो सिंहनीको देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो॥३९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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