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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 36"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 36

**चौ०** 
> चहत न भरत भूपतहि भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें॥  
> सो सबु मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू॥१॥

भावार्थ: भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जीमें कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापोंका परिणाम है, जिससे कुसमयमें ( बेमौके ) विधाता विपरीत हो गया॥१॥

**चौ०** 
> सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई॥  
> करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई॥२॥

भावार्थ: [ तेरी उजाड़ी हुई ] यह सुन्दर अयोध्या फिर भलीभाँति बसेगी और समस्त गुणोंके धाम श्रीरामकी प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकोंमें श्रीरामकी बड़ाई होगी॥२॥

**चौ०** 
> तोर कलंकु मोर पछिताऊ। मुएहुँ न मिटिहि न जाइहि काऊ॥  
> अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई॥३॥

भावार्थ: केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरनेपर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वही कर। मुँह छिपाकर मेरी आँखोंकी ओट जा बैठ ( अर्थात्‌ मेरे सामनेसे हट जा, मुझे मुँह न दिखा )॥३॥

**चौ०** 
> जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी॥  
> फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ नहारू लागी॥४॥

भावार्थ: मैं हाथ जोड़कर कहता हूँ कि जबतक मैं जीता रहूँ, तबतक फिर कुछ न कहना ( अर्थात्‌ मुझसे न बोलना )। अरी अभागिनी! फिर तू अन्तमें पछतायेगी जो तू नहारू ( ताँत ) के लिये गायको मार रही है॥४॥

**दो०** 
> परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु।  
> कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु॥३६॥

भावार्थ: राजा करोड़ों प्रकारसे ( बहुत तरहसे ) समझाकर [ और यह कहकर ] कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वीपर गिर पड़े। पर कपट करनेमें चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, मानो [ मौन होकर ] मसान जगा रही हो ( श्मशानमें बैठकर प्रेतमन्त्र सिद्ध कर रही हो )॥३६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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