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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 35"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 35

**चौ०** 
> ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता। करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता॥  
> कंठु सूख मुख आव न बानी। जनु पाठीनु दीन बिनु पानी॥१॥

भावार्थ: राजा व्याकुल हो गये, उनका सारा शरीर शिथिल पड़ गया, मानो हथिनीने कल्पवृक्षको उखाड़ फेंका हो। कण्ठ सूख गया, मुखसे बात नहीं निकलती, मानो पानीके बिना पहिना नामक मछली तड़प रही हो॥१॥

**चौ०** 
> पुनि कह कटु कठोर कैकेई। मनहुँ घाय महुँ माहुर देई॥  
> जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ। मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ॥२॥

भावार्थ: कैकेयी फिर कड़वे और कठोर वचन बोली, मानो घावमें जहर भर रही हो। [ कहती है— ] जो अन्तमें ऐसा ही करना था, तो आपने ‘माँग, माँग’ किस बलपर कहा था॥२॥

**चौ०** 
> दुइ कि होइ एक समय भुआला। हँसब ठठाइ फुलाउब गाला॥  
> दानि कहाउब अरु कृपनाई। होइ कि खेम कुसल रौताई॥३॥

भावार्थ: हे राजा! ठहाका मारकर हँसना और गाल फुलाना—क्या ये दोनों एक साथ हो सकते हैं? दानी भी कहाना और कंजूसी भी करना। क्या रजपूतीमें क्षेम-कुशल भी रह सकती है? ( लड़ाईमें बहादुरी भी दिखावें और कहीं चोट भी न लगे! )॥३॥

**चौ०** 
> छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू॥  
> तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी॥४॥

भावार्थ: या तो वचन ( प्रतिज्ञा ) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्रीकी भाँति रोइये-पीटिये नहीं। सत्यव्रतीके लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी—सब तिनकेके बराबर कहे गये हैं॥४॥

**दो०** 
> मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर।  
> लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर॥३५॥

भावार्थ: कैकेयीके मर्मभेदी वचन सुनकर राजाने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वही तुझसे यह सब कहला रहा है॥३५॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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