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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 34"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 34

**चौ०** 
> अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी। मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी॥  
> पाप पहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई॥१॥

भावार्थ: ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोधकी नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़से प्रकट हुई है और क्रोधरूपी जलसे भरी है; [ ऐसी भयानक है कि ] देखी नहीं जाती!॥१॥

**चौ०** 
> दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवँर कूबरी बचन प्रचारा॥  
> ढाहत भूपरूप तरु मूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला॥२॥

भावार्थ: दोनों वरदान उस नदीके दो किनारे हैं, कैकेयीका कठिन हठ ही उसकी [ तीव्र ] धारा है और कुबरी ( मन्थरा ) के वचनोंकी प्रेरणा ही भँवर है। [ वह क्रोधरूपी नदी ] राजा दशरथरूपी वृक्षको जड़-मूलसे ढहाती हुई विपत्तिरूपी समुद्रकी ओर [ सीधी ] चली है॥२॥

**चौ०** 
> लखी नरेस बात फुरि साँची। तिय मिस मीचु सीस पर नाची॥  
> गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी। जनि दिनकर कुल होसि कुठारी॥३॥

भावार्थ: राजाने समझ लिया कि बात सचमुच ( वास्तवमें ) सच्ची है, स्त्रीके बहाने मेरी मृत्यु ही सिरपर नाच रही है। [ तदनन्तर राजाने कैकेयीके ] चरण पकड़कर उसे बिठाकर विनती की कि तू सूर्यकुल [ रूपी वृक्ष ] के लिये कुल्हाड़ी मत बन॥३॥

**चौ०** 
> मागु माथ अबहीं देउँ तोही। राम बिरहँ जनि मारसि मोही॥  
> राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती। नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती॥४॥

भावार्थ: तू मेरा मस्तक माँग ले, मैं तुझे अभी दे दूँ। पर रामके विरहमें मुझे मत मार। जिस किसी प्रकारसे हो तू रामको रख ले। नहीं तो जन्मभर तेरी छाती जलेगी॥४॥

**दो०** 
> देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ।  
> कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ॥३४॥

भावार्थ: राजाने देखा कि रोग असाध्य है, तब वे अत्यन्त आर्तवाणीसे ‘हा राम! हा राम! हा रघुनाथ!’ कहते हुए सिर पीटकर जमीनपर गिर पड़े॥३४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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