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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 326"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 326

**चौ०** 
> पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू। जीह नामु जप लोचन नीरू॥  
> लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं॥१॥

भावार्थ: शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रोंमें प्रेमका जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं, परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं॥ १ ॥

**चौ०** 
> दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू। सब बिधि भरत सराहन जोगू॥  
> सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं॥२॥

भावार्थ: दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकारसे सराहने योग्य हैं। उनके व्रत और नियमोंको सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं॥ २ ॥

**चौ०** 
> परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू॥  
> हरन कठिन कलि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू॥३॥

भावार्थ: भरतजीका परम पवित्र आचरण ( चरित्र ) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मङ्गलोंका करनेवाला है। कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है। महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है॥ ३ ॥

**चौ०** 
> पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥  
> जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥४॥

भावार्थ: पापसमूहरूपी हाथीके लिये सिंह है। सारे सन्तापोंके दलका नाश करनेवाला है। भक्तोंको आनन्द देनेवाला और भवके भार ( संसारके दुःख )-का भञ्जन करनेवाला तथा श्रीरामप्रेमरूपी चन्द्रमाका सार ( अमृत ) है॥ ४ ॥

**छं०** 
> सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को।  
> मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को॥  
> दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को।  
> कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को॥

भावार्थ: श्रीसीतारामजीके प्रेमरूपी अमृतसे परिपूर्ण भरतजीका जन्म यदि न होता तो मुनियोंके मनको भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतोंका आचरण कौन करता? दुःख, सन्ताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषोंको अपने सुयशके बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकालमें तुलसीदास-जैसे शठोंको हठपूर्वक कौन श्रीरामजीके सम्मुख करता?

**सो०** 
> भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं।  
> सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति॥३२६॥

भावार्थ: तुलसीदासजी कहते हैं—जो कोई भरतजीके चरित्रको नियमसे आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-रससे वैराग्य होगा॥ ३२६ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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