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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 323"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 323

**चौ०** 
> सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे॥  
> पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई॥१॥

भावार्थ: भरतजीने मन्त्रियों और विश्वासी सेवकोंको समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने-अपने काममें लग गये। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजीको बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओंकी सेवा उनको सौंपी॥१॥

**चौ०** 
> भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रनाम बय बिनय निहोरे॥  
> ऊँच नीच कारजु भल पोचू। आयसु देब न करब सँकोचू॥२॥

भावार्थ: ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतजीने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्थाके अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊँचा-नीचा ( छोटा-बड़ा ), अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा॥२॥

**चौ०** 
> परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधानु करि सुबस बसाए॥  
> सानुज गे गुर गेहँ बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी॥३॥

भावार्थ: भरतजीने फिर परिवारके लोगोंको, नागरिकोंको तथा अन्य प्रजाको बुलाकर, उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नजीसहित वे गुरुजीके घर गये और दण्डवत्‌ करके हाथ जोड़कर बोले— ॥३॥

**चौ०** 
> आयसु होइ त रहौं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकि सपेमा॥  
> समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहि सोई॥४॥

भावार्थ: आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ! मुनि वसिष्ठजी पुलकितशरीर हो प्रेमके साथ बोले—हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत्‌में धर्मका सार होगा॥४॥

**दो०** 
> सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि।  
> सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि॥३२३॥

भावार्थ: भरतजीने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियोंको बुलाया और दिन ( अच्छा मुहूर्त ) साधकर प्रभुकी चरणपादुकाओंको निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासनपर विराजित कराया॥३२३॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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