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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 322"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 322

**चौ०** 
> मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू॥  
> प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥१॥

भावार्थ: मुनि, ब्राह्मण, गुरु वसिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी—सारा समाज श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें विह्वल है। प्रभुके गुणसमूहोंका मनमें स्मरण करते हुए सब लोग मार्गमें चुपचाप चले जा रहे हैं॥१॥

**चौ०** 
> जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥  
> उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥२॥

भावार्थ: [ पहले दिन ] सब लोग यमुनाजी उतरकर पार हुए। वह दिन बिना भोजनके ही बीत गया। दूसरा मुकाम गङ्गाजी उतरकर ( गङ्गापार शृङ्गवेरपुरमें ) हुआ। वहाँ रामसखा निषादराजने सब सुप्रबन्ध कर दिया॥२॥

**चौ०** 
> सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥  
> जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥३॥

भावार्थ: फिर सई उतरकर गोमतीजीमें स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी जा पहुँचे। जनकजी चार दिन अयोध्याजीमें रहे और राजकाज एवं सब साज-सामानको सँभालकर,॥३॥

**चौ०** 
> सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥  
> नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥४॥

भावार्थ: तथा मन्त्री, गुरुजी तथा भरतजीको राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुतको चले। नगरके स्त्री-पुरुष गुरुजीकी शिक्षा मानकर श्रीरामजीकी राजधानी अयोध्याजीमें सुखपूर्वक रहने लगे॥४॥

**दो०** 
> राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास।  
> तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस॥३२२॥

भावार्थ: सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग-सुखोंको छोड़-छाड़कर अवधिकी आशापर जी रहे हैं॥३२२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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