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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 321"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 321

**चौ०** 
> बिदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू॥  
> कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी॥१॥

भावार्थ: फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदयमें विरहका बड़ा भारी विषाद था। फिर श्रीरामजीने कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगोंको लौटाया। वे सब जोहार-जोहारकर ( वन्दना कर-करके ) लौटे॥ १ ॥

**चौ०** 
> प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं॥  
> भरत सनेह सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहत बखानी॥२॥

भावार्थ: प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़की छायामें बैठकर प्रियजन एवं परिवारके वियोगसे दुःखी हो रहे हैं। भरतजीके स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणीको बखान-बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसे कहने लगे॥ २ ॥

**चौ०** 
> प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी॥  
> तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट चर अचर मलीना॥३॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमके वश होकर भरतजीके वचन, मन, कर्मकी प्रीति तथा विश्वासका अपने श्रीमुखसे वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जलकी मछलियाँ, चित्रकूटके सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये॥ ३ ॥

**चौ०** 
> बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहि गति घर घर की॥  
> प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो॥४॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजीकी दशा देखकर देवताओंने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर-घरकी दशा कही ( दुखड़ा सुनाया )। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मनमें जरा-सा भी डर न रहा॥ ४॥

**दो०** 
> सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर।  
> भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥३२१॥

भावार्थ: छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसमेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों॥ ३२१ ॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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