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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 319"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 319

**चौ०** 
> सानुज राम नृपहि सिर नाई। कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई॥  
> देव दया बस बड़ दुखु पायउ। सहित समाज काननहिं आयउ॥१॥

भावार्थ: छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे विनती और बड़ाई की [ और कहा— ] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाजसहित वनमें आये॥१॥

**चौ०** 
> पुर पगु धारिअ देइ असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा॥  
> मुनि महिदेव साधु सनमाने। बिदा किए हरि हर सम जाने॥२॥

भावार्थ: अब आशीर्वाद देकर नगरको पधारिये। यह सुन राजा जनकजीने धीरज धरकर गमन किया। फिर श्रीरामचन्द्रजीने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु और शिवजीके समान जानकर सम्मान करके उनको विदा किया॥२॥

**चौ०** 
> सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥  
> कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥३॥

भावार्थ: तब श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई सास ( सुनयनाजी ) के पास गये और उनके चरणोंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरणवाले कुटुम्बी, नगरनिवासी और मन्त्री— ॥३॥

**चौ०** 
> जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥  
> नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥४॥

भावार्थ: सबको छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने छोटे, मध्यम ( मझले ) और बड़े सभी श्रेणीके स्त्री-पुरुषोंका सम्मान करके उनको लौटाया॥४॥

**दो०** 
> भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।  
> बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि॥३१९॥

भावार्थ: भरतकी माता कैकेयीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने पवित्र ( निश्छल ) प्रेमके साथ उनसे मिल-भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोचको मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया॥३१९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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