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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 318"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 318

**चौ०** 
> जहाँ जनक गुर गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी॥  
> बरनत रघुबर भरत बियोगू। सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू॥१॥

भावार्थ: जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत ( लौकिक ) कहनेमें बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहृदय समझेंगे॥१॥

**चौ०** 
> सो सकोच रसु अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी॥  
> भेंटि भरतु रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए॥२॥

भावार्थ: वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया॥२॥

**चौ०** 
> सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई॥  
> सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा। लगे चलन के साजन साजा॥३॥

भावार्थ: सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजोंमें दारुण दुःख छा गया। वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे॥३॥

**चौ०** 
> प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई॥  
> मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी॥४॥

भावार्थ: प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की॥४॥

**दो०** 
> लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।  
> चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि॥३१८॥

भावार्थ: फिर लक्ष्मणजीको क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको सिरपर धारण करके और समस्त मङ्गलोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले॥३१८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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