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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 317"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 317

**चौ०** 
> सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की॥  
> नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा॥१॥

भावार्थ: वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो ( उच्चाटन न होता तो ) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर ( हाय-हाय करके ) मर ही जाते॥ १ ॥

**चौ०** 
> रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी॥  
> भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो॥२॥

भावार्थ: श्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी। देवताओंकी सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक ( हितकारी ) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल रहे हैं। श्रीरामजीके प्रेमका वह रस ( आनन्द ) कहते नहीं बनता॥ २ ॥

**चौ०** 
> तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा॥  
> बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी॥३॥

भावार्थ: तन, मन और वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा। धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रोंसे [ प्रेमाश्रुओंका ] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओंकी सभा ( समाज ) दुःखी हो गयी॥ ३ ॥

**चौ०** 
> मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से॥  
> जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए॥४॥

भावार्थ: मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्निमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निर्लेप ही रचा और जो जगत्‌रूपी जलमें कमलके पत्तेकी तरह ही ( जगत्‌में रहते हुए भी जगत्‌से अनासक्त ) पैदा हुए, ॥ ४॥

**दो०** 
> तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।  
> भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार॥३१७॥

भावार्थ: वे भी श्रीरामजी और भरतजीके उपमारहित अपार प्रेमको देखकर वैराग्य और विवेकसहित तन, मन, वचनसे उस प्रेममें मग्न हो गये॥ ३१७॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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