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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 312"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 312

श्रीराम-भरत-संवाद,पादुका-प्रदान,भरतजीकी विदाई

**चौ०** 
> एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं॥  
> पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा॥१॥

भावार्थ: इस प्रकार भरतजी वनमें फिर रहे हैं। उनके नियम और प्रेमको देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जलके स्थान ( नदी, बावली, कुण्ड आदि ), पृथ्वीके पृथक्‌-पृथक्‌ भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण ( घास ), पर्वत, वन और बगीचे— ॥१॥

**चौ०** 
> चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी॥  
> सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ॥२॥

भावार्थ: सभी विशेषरूपसे सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मनसे सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य-प्रभावको कहते हैं॥२॥

**चौ०** 
> कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा॥  
> कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई॥३॥

भावार्थ: भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानोंके दर्शन करते हैं और कहीं मुनि अत्रिजीकी आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजीसहित श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाइयोंका स्मरण करते हैं॥३॥

**चौ०** 
> देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा॥  
> फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई॥४॥

भावार्थ: भरतजीके स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभावको देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम-फिरकर ढाई पहर दिन बीतनेपर लौट पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजीके चरणकमलोंका दर्शन करते हैं॥४॥

**दो०** 
> देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ।  
> कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ॥३१२॥

भावार्थ: भरतजीने पाँच दिनमें सब तीर्थस्थानोंके दर्शन कर लिये। भगवान्‌ विष्णु और महादेवजीका सुन्दर यश कहते-सुनते वह ( पाँचवाँ ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी॥३१२॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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