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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 311"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 311

**चौ०** 
> कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती॥  
> नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई॥१॥

भावार्थ: प्रेमपूर्वक धर्मके इतिहास कहते वह रात सुखसे बीत गयी और सबेरा हो गया। भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई नित्यक्रिया पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वसिष्ठजीकी आज्ञा पाकर, ॥१॥

**चौ०** 
> सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें॥  
> कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं॥२॥

भावार्थ: समाजसहित सब सादे साजसे श्रीरामजीके वनमें भ्रमण ( प्रदक्षिणा ) करनेके लिये पैदल ही चले। कोमल चरण हैं और बिना जूतेके चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन-ही-मन सकुचाकर कोमल हो गयी॥२॥

**चौ०** 
> कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं॥  
> महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे॥३॥

भावार्थ: कुश, काँटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओंको छिपाकर पृथ्वीने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये। सुखोंको साथ लिये ( सुखदायक ) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी॥३॥

**चौ०** 
> सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं॥  
> मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी॥४॥

भावार्थ: रास्तेमें देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल-फलकर, तृण अपनी कोमलतासे, मृग ( पशु ) देखकर और पक्षी सुन्दर वाणी बोलकर—सभी भरतजीको श्रीरामचन्द्रजीके प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे॥४॥

**दो०** 
> सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात।  
> राम प्रानप्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात॥३११॥

भावार्थ: जब एक साधारण मनुष्यको भी [ आलस्यसे ] जँभाई लेते समय ‘राम’ कह देनेसे ही सब सिद्धियाँ सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजीके प्राणप्यारे भरतजीके लिये यह कोई बड़ी ( आश्चर्यकी ) बात नहीं है॥३११॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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