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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 310"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 310

**चौ०** 
> भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई॥  
> सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू॥१॥

भावार्थ: भरतजीने अत्रिमुनिकी आज्ञा पाकर जलके सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुघ्न, अत्रि मुनि तथा अन्य साधु-सन्तोंसहित आप वहाँ गये जहाँ वह अथाह कुआँ था॥१॥

**चौ०** 
> पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा॥  
> तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू॥२॥

भावार्थ: और उस पवित्र जलको उस पुण्यस्थलमें रख दिया। तब अत्रि ऋषिने प्रेमसे आनन्दित होकर ऐसा कहा—हे तात! यह अनादि सिद्धस्थल है। कालक्रमसे यह लोप हो गया था इसलिये किसीको इसका पता नहीं था॥२॥

**चौ०** 
> तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा॥  
> बिधिबस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू॥३॥

भावार्थ: तब [ भरतजीके ] सेवकोंने उस जलयुक्त स्थानको देखा और उस सुन्दर [ तीर्थोंके ] जलके लिये एक खास कुआँ बना लिया। दैवयोगसे विश्वभरका उपकार हो गया। धर्मका विचार जो अत्यन्त अगम था, वह [ इस कूपके प्रभावसे ] सुगम हो गया॥३॥

**चौ०** 
> भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा॥  
> प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी॥४॥

भावार्थ: अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे। तीर्थोंके जलके संयोगसे तो यह अत्यन्त ही पवित्र हो गया। इसमें प्रेमपूर्वक नियमसे स्नान करनेपर प्राणी मन, वचन और कर्मसे निर्मल हो जायँगे॥४॥

**दो०** 
> कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ।  
> अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ॥३१०॥

भावार्थ: कूपकी महिमा कहते हुए सब लोग वहाँ गये जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। श्रीरघुनाथजीको अत्रिजीने उस तीर्थका पुण्य प्रभाव सुनाया॥३१०॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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