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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 309"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 309

भरतजीका तीर्थ-जल-स्थापन तथा चित्रकूटभ्रमण

**चौ०** 
> धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआईं॥  
> मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू॥१॥

भावार्थ: ‘भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजीकी जय हो!’ ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक ( अत्यधिक ) हर्षित होने लगे। भरतजीके वचन सुनकर मुनि वसिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभामें सब किसीको बड़ा उत्साह ( आनन्द ) हुआ॥१॥

**चौ०** 
> भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू॥  
> सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन॥२॥

भावार्थ: भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहकी तथा प्रेमकी विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनोंका सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्रको भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं॥२॥

**चौ०** 
> मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे॥  
> सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू॥३॥

भावार्थ: मन्त्री और सभासद सभी प्रेममुग्ध होकर अपनी-अपनी बुद्धिके अनुसार सराहना करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीका संवाद सुन-सुनकर दोनों समाजोंके हृदयोंमें हर्ष और विषाद ( भरतजीके सेवाधर्मको देखकर हर्ष और रामवियोगकी सम्भावनासे विषाद ) दोनों हुए॥३॥

**चौ०** 
> राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी॥  
> एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई॥.४॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीकी माता कौसल्याजीने दुःख और सुखको समान जानकर श्रीरामजीके गुण कहकर दूसरी रानियोंको धैर्य बँधाया। कोई श्रीरामजीकी बड़ाई ( बड़प्पन ) की चर्चा कर रहे हैं, तो कोई भरतजीके अच्छेपनकी सराहना करते हैं॥४॥

**दो०** 
> अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप।  
> राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप॥३०९॥

भावार्थ: तब अत्रिजीने भरतजीसे कहा—इस पर्वतके समीप ही एक सुन्दर कुआँ है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत-जैसे तीर्थजलको उसीमें स्थापित कर दीजिये॥३०९॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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