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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 308"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 308

**चौ०** 
> एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं॥  
> कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई॥१॥

भावार्थ: मेरे मनमें एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोचके कारण कहा नहीं जाता। [ श्रीरामचन्द्रजीने कहा— ] हे भाई! कहो। तब प्रभुकी आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले—॥१॥

**चौ०** 
> चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन॥  
> प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी॥२॥

भावार्थ: आज्ञा हो तो चित्रकूटके पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पक्षी-पशु, तालाब-नदी, झरने और पर्वतोंके समूह तथा विशेषकर प्रभु ( आप ) के चरणचिह्नोंसे अंकित भूमिको देख आऊँ॥२॥

**चौ०** 
> अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू॥  
> मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता॥३॥

भावार्थ: [ श्रीरघुनाथजी बोले— ] अवश्य ही अत्रि ऋषिकी आज्ञाको सिरपर धारण करो ( उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो ) और निर्भय होकर वनमें विचरो। हे भाई! अत्रि मुनिके प्रसादसे वन मङ्गलोंका देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है—॥३॥

**चौ०** 
> रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं॥  
> सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा॥४॥

भावार्थ: और ऋषियोंके प्रमुख अत्रिजी जहाँ आज्ञा दें, वहीं [ लाया हुआ ] तीर्थोंका जल स्थापित कर देना। प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने सुख पाया और आनन्दित होकर मुनि अत्रिजीके चरणकमलोंमें सिर नवाया॥४॥

**दो०** 
> भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल।  
> सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल॥३०८॥

भावार्थ: समस्त सुन्दर मङ्गलोंका मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजीका संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुलकी सराहना करके कल्पवृक्षके फूल बरसाने लगे॥३०८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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