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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 304"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 304

**चौ०** 
> भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ॥  
> कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को॥१॥

भावार्थ: भरतजीके स्वभावका वर्णन वेदोंके लिये भी सुगम नहीं है। [ अतः ] मेरी तुच्छ बुद्धिकी चञ्चलताको कविलोग क्षमा करें! भरतजीके सद्भावको कहते-सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजीके चरणोंमें अनुरक्त न हो जायगा॥१॥

**चौ०** 
> सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभु तेहि सरिस बाम को॥  
> देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की॥२॥

भावार्थ: भरतजीका स्मरण करनेसे जिसको श्रीरामजीका प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम ( अभागा ) और कौन होगा? दयालु और सुजान श्रीरामजीने सभीकी दशा देखकर और भक्त ( भरतजी ) के हृदयकी स्थिति जानकर, ॥२॥

**चौ०** 
> धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर॥  
> देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू॥३॥

भावार्थ: धर्मधुरन्धर, धीर, नीतिमें चतुर; सत्य, स्नेह, शील और सुखके समुद्र; नीति और प्रीतिके पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल, अवसर और समाजको देखकर, ॥३॥

**चौ०** 
> बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से॥  
> तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना॥४॥

भावार्थ: [ तदनुसार ] ऐसे वचन बोले जो मानो वाणीके सर्वस्व ही थे, परिणाममें हितकारी थे और सुननेमें चन्द्रमाके रस ( अमृत )-सरीखे थे। [ उन्होंने कहा— ] हे तात भरत! तुम धर्मकी धुरीको धारण करनेवाले हो, लोक और वेद दोनोंके जाननेवाले और प्रेममें प्रवीण हो॥४॥

**दो०** 
> करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात।  
> गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात॥३०४॥

भावार्थ: हे तात! कर्मसे, वचनसे और मनसे निर्मल तुम्हारे समान तुम्हीं हो। गुरुजनोंके समाजमें और ऐसे कुसमयमें छोटे भाईके गुण किस तरह कहे जा सकते हैं?॥३०४॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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