---
title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 301"
canonical: "https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-301"
lang: "hi"
---

# अयोध्याकाण्ड · दोहा 301

**चौ०** 
> प्रभु पद पदुम पराग दोहाई। सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई॥  
> सो करि कहउँ हिए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की॥१॥

भावार्थ: प्रभु ( आप ) के चरणकमलोंकी रज, जो सत्य, सुकृत ( पुण्य ) और सुखकी सुहावनी सीमा ( अवधि ) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदयकी जागते, सोते और स्वप्नमें भी बनी रहनेवाली रुचि ( इच्छा ) कहता हूँ॥ १ ॥

**चौ०** 
> सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल फल चारि बिहाई॥  
> अग्या सम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा॥२॥

भावार्थ: वह रुचि है—कपट, स्वार्थ और [ अर्थ-धर्म-काम-मोक्षरूप ] चारों फलोंको छोड़कर स्वाभाविक प्रेमसे स्वामीकी सेवा करना। और आज्ञापालनके समान श्रेष्ठ स्वामीकी और कोई सेवा नहीं है। हे देव! अब वही आज्ञारूप प्रसाद सेवकको मिल जाय॥ २ ॥

**चौ०** 
> अस कहि प्रेम बिबस भए भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी॥  
> प्रभु पद कमल गहे अकुलाई। समउ सनेहु न सो कहि जाई॥३॥

भावार्थ: भरतजी ऐसा कहकर प्रेमके बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा, नेत्रोंमें [ प्रेमाश्रुओंका ] जल भर आया। अकुलाकर ( व्याकुल होकर ) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके चरणकमल पकड़ लिये। उस समयको और स्नेहको कहा नहीं जा सकता॥ ३॥

**चौ०** 
> कृपासिंधु सनमानि सुबानी। बैठाए समीप गहि पानी॥  
> भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ॥४॥

भावार्थ: कृपासिन्धु श्रीरामचन्द्रजीने सुन्दर वाणीसे भरतजीका सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजीकी विनती सुनकर और उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेहसे शिथिल हो गये॥ ४॥

**छं०** 
> रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी।  
> मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी॥  
> भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से।  
> तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से॥

भावार्थ: श्रीरघुनाथजी, साधुओंका समाज, मुनि वसिष्ठजी और मिथिलापति जनकजी स्नेहसे शिथिल हो गये। सब मन-ही-मन भरतजीके भाईपन और उनकी भक्तिकी अतिशय महिमाको सराहने लगे। देवता मलिन मनसे भरतजीकी प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं—सब लोग भरतजीका भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रिके आगमनसे कमल!

**सो०** 
> देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब।  
> मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत॥३०१॥

भावार्थ: दोनों समाजोंके सभी नर-नारियोंको दीन और दुःखी देखकर महामलिन-मन इन्द्र मरे हुओंको मारकर अपना मङ्गल चाहता है॥३०१॥

Previous: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-300  
Kand: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand  
Next: https://ramayana.com/hi/ramcharitmanas/ayodhya-kand/doha-302

---

स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

Ramayana.com, वेदव्यास फ़ाउंडेशन। निःशुल्क, विज्ञापन रहित।
