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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 298"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 298

**चौ०** 
> प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी॥  
> सरल सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू॥१॥

भावार्थ: हे प्रभु! आप पिता, माता, सुहृद्‌ ( मित्र ), गुरु, स्वामी, पूज्य, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरलहृदय, श्रेष्ठ मालिक, शीलके भण्डार, शरणागतकी रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान,॥१॥

**चौ०** 
> समरथ सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी॥  
> स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाईं। मोहि समान मैं साइँ दोहाईं॥२॥

भावार्थ: समर्थ, शरणागतका हित करनेवाले, गुणोंका आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापोंको हरनेवाले हैं। हे गोसाईं! आप-सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामीके साथ द्रोह करनेमें मेरे समान मैं ही हूँ॥२॥

**चौ०** 
> प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयउँ इहाँ समाजु सकेली॥  
> जग भल पोच ऊँच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू॥३॥

भावार्थ: मैं मोहवश प्रभु ( आप ) के और पिताजीके वचनोंका उल्लङ्घनकर और समाज बटोरकर यहाँ आया हूँ। जगत्‌में भले-बुरे, ऊँचे और नीचे, अमृत और अमरपद ( देवताओंका पद ), विष और मृत्यु आदि— ॥३॥

**चौ०** 
> राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं॥  
> सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई॥४॥

भावार्थ: किसीको भी कहीं ऐसा नहीं देखा-सुना जो मनमें भी श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) की आज्ञाको मेट दे। मैंने सब प्रकारसे वही ढिठाई की, परन्तु प्रभुने उस ढिठाईको स्नेह और सेवा मान लिया!॥४॥

**दो०** 
> कृपाँ भलाईं आपनी नाथ कीन्ह भल मोर।  
> दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर॥२९८॥

भावार्थ: हे नाथ! आपने अपनी कृपा और भलाईसे मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण ( दोष ) भी भूषण ( गुण ) के समान हो गये और चारों ओर मेरा सुन्दर यश छा गया॥२९८॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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