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title: "अयोध्याकाण्ड दोहा 296"
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# अयोध्याकाण्ड · दोहा 296

**चौ०** 
> करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सबु काजु अकाजू॥  
> गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा॥१॥

भावार्थ: कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि कामका बनना-बिगड़ना सब भरतजीके हाथ है। इधर राजा जनकजी [ मुनि वसिष्ठ आदिके साथ ] श्रीरघुनाथजीके पास गये। सूर्यकुलके दीपक श्रीरामचन्द्रजीने सबका सम्मान किया,॥१॥

**चौ०** 
> समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा॥  
> जनक भरत संबादु सुनाई। भरत कहाउति कही सुहाई॥२॥

भावार्थ: तब रघुकुलके पुरोहित वसिष्ठजी समय, समाज और धर्मके अविरोधी ( अर्थात्‌ अनुकूल ) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजीका संवाद सुनाया। फिर भरतजीकी कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं॥२॥

**चौ०** 
> तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू॥  
> सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी॥३॥

भावार्थ: [ फिर बोले— ] हे तात राम! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले— ॥३॥

**चौ०** 
> बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भाँति भदेसू॥  
> राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई॥४॥

भावार्थ: आपके और मिथिलेश्वर जनकजीके विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकारसे भद्दा ( अनुचित ) है। आपकी और महाराजकी जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूँ वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी॥४॥

**दो०** 
> राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत।  
> सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न ऊतरु देत॥ २९६ ॥

भावार्थ: श्रीरामचन्द्रजीकी शपथ सुनकर सभासमेत मुनि और जनकजी सकुचा गये ( स्तम्भित रह गये )। किसीसे उत्तर देते नहीं बनता, सब लोग भरतजीका मुँह ताक रहे हैं॥२९६॥

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स्रोत: गीताप्रेस, गोरखपुर। पुस्तक खरीदें: https://gitapress.org/product/sri-ramcharitmanas-special-edition

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